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आखिर क्यों है वृद्धाश्रम एक कविता

आखिर क्यों है वृद्धाश्रम   

वह वृद्ध महिला मंदिरों की  चौखट पर बैठी थी
इस आस में कि उसका बच्चा आएगा
लेकिन सोचा तो उसने भी नहीं होगा कि वह अपनी मां को जो मंदिर के चौखट पर ही छोड़ जाएगा

आजकल के बच्चे रिश्ते निभाने में सो गए
 आजकल के बच्चे सच में एडवांस हो गए

 जो कि मां बाप को कबाड़ सोचते हैं
सोच कर ही रूह कांप जाती है कि दौलत और प्रॉपर्टी ऐठने के लिए भूखे गिद्ध की तरह जिस्म को नोचते हैं

जिन मां बाप ने अपनी जिंदगी खर्च कर ली उन्हीं के बच्चे उनके बुढ़ापे में रुपया खर्च करने में हिचकते हैं
मां बाप ने उन्हें जिंदगी भर संभाला वही बच्चे अपनी मां बाप को बुढ़ापे में  संभालने  पीछे की और कसकते  हैं

पाई पाई का मोहताज बना लेते हैं
मां बाप की उम भर मोहब्बत का वह यह सिला देते हैं

मां-बाप उस जड़ की तरह है जिसके बिना पेड़ बंजर रह जाते हैं
मां बाप के बिना आशियाना कितना ही बड़ा क्यों नहीं हो लेकिन वह तिनके  की तरह बह जाते हैं

उम्र उनकी भी आएगी
 बुढ़ापा उनका भी आएगा
समझ जाने के बाद उस दिन बहुत पछताएगा

मां बाप से नाता नहीं तोड़ो
 उन्हें बुढ़ापे में वृद्धाश्रम नहीं छोड़ो

लेखक :- जय जेतवनी 

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