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बहन का प्यार कहानी

बहन का प्यार


मां के गुजर जाने के बाद वह छोटी सी संगमरमर सी पंद्रह सोलह साल की बरखा पर  अपनी छोटी बहन सरला की जिम्मेदारी आ गई थी घर घर जाकर छोटे-मोटे काम करने से पचास-सौ रुपए मिलते थे। उसमें से भी पिता की शराब पीने की गंदी लत को पूरा करने में सारे पैसे खर्च हो जाते थे।
बरखा खुद भूखी  रहकर भी जैसे तैसे करके अपनी छोटी बहन सरला का लालन-पालन करती थी।
एक दिन जब बरखा रसोई का  कार्य कर रही थी।



 तभी उसने किसी के हल्के हल्के कदमों की आहट सुनी तभी उसने तेजी से अपनी कदम बढ़ाए और जैसे ही उसने देखा कि उसके बाबा फिर से शराब की लत के लिए पैसे चुरा रहे हैं तो फिर बरखा ने चिल्ला कर कहा:-
"बाबा यह आप क्या कर रहे हो, यह सरला के लिए बचे हुए पैसे हैं।"

इतना कहते हुए बरखा ने वह पैसे अपने बाबा से छीन लिए तो फिर यह देख कर उसके बाबा गुस्सा हो गए और उन्होंने पालने में झूल रही सरला को उठाते हुए कहा " देख पैसा  दे वरना इसे मार दूंगा या बेच दूंगा।"
बरखा रोती बिलखती रही आखिर बरखा को कुछ समझ नहीं आया बरखा को आंगन में एक बड़ा बास का डंडा दिखा और बरखा ने आव देखा ना ताव वह बांस का डंडा उठाया और अपने बाबा पर दे मारा। बास का डंडा इतनी जोर से सर पर जा लगा कि पूरा आंगन खून से लाल हो गया और उसके बाबा ने वहीं पर दम तोड़ दिया।
बरखा को अपने किए गए इस हादसे का पछतावा तो बहुत था।

हफ्ते निकल गए, लेकिन बरखा के चेहरे पर उदासी गई नहीं थी। बरखा लोगों के  घरों पर काम करने लगी थी उसे जो भी मिलता वह अपनी बहन सरला की देखभाल में खर्च कर देती थी।
एक दिन बरखा जब घर पर काम कर रही थी। तभी अचानक से तेजी से आ रहे कदमों की आहट को सुनकर बरखा ने अपनी नजरों को पलट कर देखा  तो शराबी माखन खड़ा था। माखन को देखने के बाद बरखा ने कहा:-
" चले जहां यहां से बाबा ने तुझसे जितना भी पैसा लिया था वह सब मैं धीरे-धीरे तुझे लौटा दूंगी, अभी यहां से निकल जा वरना सभी गांव वालों को बुला दूंगी।"

बरखा की यह बात सुनते हुए माखन ने हंसते हुए कहा  " मैं तो अपना पैसा लेने आया हूं तू जो कर सकती है कर ले लेकिन मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा । क्योंकि मैंने तेरे बाबा को जुए और शराब के लिए बहुत सारा पैसा दिया था "
इतना कहते हुए माखन ने  बरखा को घूरते हुए कहा:-
" सुना है कि तेरी आई बाबा नहीं रहे देख तुझे जरूरत  है  पैसों की तो तुझे जितना पैसा चाहिए मैं दूंगा और इतना ही नहीं तेरे बाबा का लिया हुआ सारा पैसा माफ, बस तू मेरी रखनी बन जा । "
बरखा ने माखन के इरादों को भाप लिया था । माखन जबरदस्ती पर उतर आया था यह देख कर बरखा ने माखन को धक्का देते हुए कहा
" चले जा यहां से तू  और तुझे शर्म नहीं आती इस तरह की बातें करते हुए ।"
यह बात सुनते हुए माखन आग बबूला हो गया और उसने गुस्से में कहा
" अगर तू मेरी रखनी नहीं बनी तो मैं तेरी छोटी बहन को अगवा कर लूंगा।"
यह बात सुनते हुए बरखा भी आग बबूला  हो गई और उसने माखन को जोर से उसके गालों पर एक थप्पड़ झड़ दिया। माखन भी तेज गुस्से वाली घुर्राती आंखों से बरखा को देखते हुए वहां से चला गया।
थोड़ी देर बाद रामू काका बरखा के घर आए। रामू काका ने अपने माथे से आते पसीने को साफ करते हुए कहा  वह मास्टर जी ने कहा है कि:-
 "अगर पाठशाला की फीस ना दी तो वह सरला को पाठशाला से निकाल देंगे।"
रामू काका की बात सुनते  परेशान होती हुई बरखा ने कहा:-
" ठीक है मैं आज कहीं से कुछ रुपयों का इंतजाम करती हूँ।"

लेकिन बरखा की समस्याएं बहुत बढ़ चुकी थी क्योंकि लड़ाकू माखन के वजह से सभी ने उसे काम से निकाल दिया था। घर में बढ़ रही परेशानियों और सरला के लिए भूख प्यास और लाचारी के चलते बरखा ने अपने घुटने टेक दिए।
आखिर में उसने माखन की सारी बातों को स्वीकार कर दिया।

अब बरखा गुमसुम चुपचाप  एक  बेजान लाश की तरह रहती थी। माखन आए दिन शराब के नशे में रेशमा पर जुल्म करता , उसे मारता पीटता था।
माखन ने हद पार कर रखी थी उसने बरखा को जिस्मफरोशी के गंदी कीचड़ में धकेल दिया था। अब बरखा सरला के लिए सब कुछ सह लेती थी।

बरखा मानसिक और शारीरिक पीड़ा से जूझती रहती थी। बरखा को इस बात की खुशी  थी कि सरला एक अच्छी पाठशाला में जाने लगी थी। धीरे-धीरे सरला भी इस तरह से बढ़ने लगी थी, जैसे आसमान में धीरे-धीरे पूर्णिमा का चांद निकलता हो। बरखा ने सरला को बहुत पढ़ा लिखाया , उसे एक काबिल वकील बनाया और उसका विवाह एक अच्छे परिवार में किया और दहेज के रूप में बरखा ने अपना सब कुछ सरला के नाम पर कर दिया। बढ़ती उम्र के चलते अब बरखा के चेहरे पर झुर्रियां आ गई थी।

सरला अपनी खुश शादीशुदा जिंदगी से बहुत खुश थी लेकिन जब उसे अपनी बहन का यह सच पता चला कि
"वह अपने ही पिता की हत्यारन और उसके माखन के साथ अवैध संबंध थे तो उसने बरखा से अपने सारे रिश्ते तोड़ दिए।"

अपनी बची कुची जिंदगी अब बरखा वृद्धाश्रम में बिताने के लिए मजबूर हो चुकी थी अब बरखा की आंखों में बस अपनी बहन सरला का इंतजार था वह चाहती थी कि सारे शिकवे गिले मिटा कर सरला प्यार से उसे बहन पुकारे।
धीरे धीरे अब बरखा को अकेले में तन्हाई के साथ रहने की आदत हो चुकी थी एक दिन अचानक से खटिया पर बरखा तड़पने लगी थी सभी कार्यकर्ता वहां आ गए थे एंबुलेंस को कॉल लगाया जा रहा था। लेकिन एंबुलेंस में जाने से पहले बरखा ने सभी से विनती की कि
 "वह एक बार अपनी बहन से बात करना चाहती है।"

सरला को फोन लगाया गया जैसे ही सरला ने फोन उठाया और बरखा ने उसे अपने कानों पर रखा और जैसे ही सरला ने प्रश्न किया की "जी कौन है?"
बरखा के चेहरे पर एक खुशी झलक रही थी वह आगे कुछ कह पाती कि उससे पहले ही उसकी सांसे उसके जिस्म से उधड़ने लगी थी और बरखा ने वहीं पर दम तोड़ दिया।

लेखक :- जय जेतवानी

Image by prettysleepy1 from Pixabay

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