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दुख में याद सब करे सुख में पूछे न कोई कहानी

कहानी  

भोर सवेरे नहा धोकर  सफेद धोती और भगवा रंग की पतली सी कमीज पहने राधे राधे का जाप करते हुए पंडित व्यास जी ने मंदिर में अपना कदम रखा कुछ छोटी भगवान की मूर्तियों को एक मुलायम दार कपड़े से साफ  कर उन पर लगी धूल को मिटा रहे थे और बड़ी मूर्तियों को पानी से साफ कर फूल को उन पर रख रहे थे कि तभी 20 या 22 वर्षीय युवक जिसकी एक हाथ में जल का लोटा और दूसरे हाथ में मोबाइल को चलाते हुए  वह भी मंदिर में प्रवेश करता है वह युवक इस तरह से मग्न था अपने फोन में कि वह मंदिर में कब उसने प्रवेश कर दिया उसे पता ही नहीं चला। पंडित व्यास जी ने उस युवक का ध्यान भंग करने के लिए ऊंचे स्वर में राधे राधे का उच्चारण किया । वह राधे-राधे की सुने सुनने के बाद वह युवक चौक गया और फिर उसने नजरें उठाकर पंडित जी को देखा और उनके राधे राधे का जवाब देते हुए कहा "जी पंडित जी राधे राधे...."

दुख में याद सब करे सुख में पूछे न कोई  कहानी
दुख में याद सब करे सुख में  पूछे न कोई कहानी 


इतना कहने के बाद वह फिर से अपने फोन में मग्न हो गया और फिर पंडित व्यास जी भी अपने काम में व्यस्त हो गए। करीबन कुछ देर बाद पंडित व्यास जी ने उस युवक से पूछा
 "कहां से आए हैं आप"
अचानक से वह शांत वातावरण में आवाज सुन वह युवक इस तरह से चौक गया मानो जैसे किसी ने उसे उसे उसकी गहरी निंद्रा से जगाया हो, उसने अपने फोन को तेजी से जींस की जेब में डालते पंडित जी से कहां
 " जी मैं इसी एरिया का रहने वाला हूं। मेरा घर इस मंदिर से कुछ कदम की दूर पर ही है।"

यह बात सुनने के बाद पंडित व्यास जी ने अचंभा जाहिर करते हुए कहा
 " जी,आपका इस मंदिर के कुछ कदम की दूरी पर आपका घर है परंतु पहले आप को कभी देखा नहीं।"
उस युवक ने हंसते हुए कहा
 " जी दरअसल मैं कभी कबार ही मंदिर में आता हूं। जब आप उस वक्त आरती कर रहे होते हैं।"
इतना कहने के बाद वह युवक पूजा स्थल पर बैठ गया और पूजा करना आरंभ कर दिया। पंडित जी भी अपने दूसरे काम में मग्न हो गए परंतु कुछ देर पश्चात वह युवक घबराहट की मुद्रा में आते हुए माथे पर ढेर सारी शिकंज और अजीब सी हड़बड़ाहट  लेते हुए एवं उसका सारा ध्यान अब एक घड़ी पर केंद्रित था और बढ़ते वक्त के क्रम को देखते हुए वह बड़ा ही बेचैन हो रहा था और उसके मुख से निकलने वाली जाप भी तीव्र गति ले चुके थे एवं उसकी मुख से जाप के बीच में एक ही बात निकल रही थी
" हे प्रभु तू तो मेरा सब कुछ है तू ही मेरा दाता है तू ही मेरा पिता तू है मेरा माता है मेरा काम कर देना प्रभु मेरा काम कर देना।"

यह स्वर पंडित व्यास जी भी सुन रहे थे तभी उस युवक के अचानक से उसके फोन में एक घंटी बजी और उस युवक ने अपने जाप को विराम देते हुए अपना फोन निकाला एवं उसकी फोन में एक संदेश आया था उस संदेश को पढ़ा । कब उसकी माथे पर ढेर सारी वह सिकंज और वह घबराहट कब चली गई पता ही नहीं चला, और वह खुशी के मारे खड़ा हुआ और कहने लगा
" मेरे अच्छे मार्क्स आ गए , मैं पास हो गया।"
और यह कहते हुए तेजी से चप्पल पहनते हुए घर की ओर रवाना हो गया। पंडित व्यस्त थे लेकिन वह यह सारा दृश्य देख रहे थे और सोच रहे थे  पहले मनुष्य जब कष्ट में होते हैं तो  भगवान को अपना सब कुछ मान लेते हैं यहां तक की प्रार्थनाएं करने बैठ जाते हैं। परंतु जैसे ही संकट या कष्ट  एवं दुख समाप्त होता है तो भगवान को भूल क्यों जाते हैं। क्यों हम भगवान को दर्द तकलीफ के वक्त तो अपना कहते हैं लेकिन सुख में भूल जाते हैं।
इतना सब सोचने के बाद पंडित व्यास जी सवेरे की आरती के लिए तैयारी करने में जुड़ गए।

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