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" शतरंज का खेल " sad poem in hindi

शतरंज का खेल 


" शतरंज का खेल "  sad poem in hindi
" शतरंज का खेल "  sad poem in hindi

क्यों सब आजाद लेकिन मैं कैद हूं
कैसा शतरंज का खेल है
 यह जहां सब काले
 लेकिन मैं सफेद हूं
कभी कबार मन खामोश हो आता है
तो कभी कबार यह  मन
में जोरो से शोर
सा मच जाता है
कभी सजने सवरने का मन हो आता है
तो कभी कबार यह मन
वीरान सा  होने को आता है
जहां मैं अल्फाजों को ढूंढ कर लाती हूं
लेकिन फिर उन्हें अल्फाजो
 को किसी और के
लेख में पाती हूं
कभी कबार भीड़ में भी डर जाती हूं
तो कभी कबार अकेले
ही सुनसान सफर पार
कर जाती हूँ
क्यों सब आजाद लेकिन मैं कैद हूं
कैसा शतरंज का खेल है
यह जहां सब काले
लेकिन मैं सफेद हूं

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