.

" तन्हाई और मैं " sad hindi poem

तन्हाई और मैं 


" तन्हाई और मैं "  sad hindi poem
" तन्हाई और मैं "  sad hindi poem
अक्सर बिछड़ जाती हूं मैं
अक्सर खुद से लड़ जाती हूं मैं
अक्सर खुद को तन्हाई मे लाती हूं मैं
इसीलिए अपने रूह को फिर से
अपने विरान जिस्म में पाती हूं मैं
दुनिया समझती है कि सुलझी हुई हूं मैं
लेकिन खुद में ही  उलझी हुई हूं मैं
मेरी अच्छाई से जल आते हैं
सिर्फ मतलब के वक्त
 मेरे पास चल आते हैं
खोखले जिस्म का गुमान
मैं नहीं करती हूं
इस जिस्म की कैद से आजाद
होने से मैं नहीं डरती हूं

Post a Comment

0 Comments