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बंजारे poem in hindi

"बंजारे"

बंजारे poem in hindi
बंजारे poem in hindi

आज गली के नुक्कड़ पर बड़ी भीड़ लगी थी पास जाकर देखा तो कुछ बंजारे आए थे
 नाटक दिखाने का सामान लाए थे

जहां छोटी सी बच्ची ने  ऊंचे बांस के डंडे पर बंधी  रस्सी पर बिना रुके चलने से उसके पैरों के नाखून और चमड़ी तक  बुरी तरह से कुचल गए
बुरा लगा इतनी मेहनत करने के बावजूद लोगों के जेबों से केवल कुछ चिल्लर ही उछल गए

उस बच्ची की बस छोटी सी तो  यह आस थी कि, आज कुछ तो मिल ही जाएगा
जिससे हो ना हो, आज का दिन तो निकल ही जाएगा

 पैसों की वजह से रिश्ते आपस में ही दूर हो जाते हैं
वहीं भूख के चलते नन्हे हाथ भीख मांगने के लिए मजबूर हो जाते हैं

उस गरीब नन्हे बच्चे ने केक और पेस्ट्री ही अपने पिता से मांगा था लेकिन
उस बात पर उसके पिता ने उसे बहुत मारा था
वह उस पिता की मजबूरी थी क्योंकि वह खुद गरीबी से हारा था

वह नन्हा छोटा सा जिस्म जिस पर नहीं कपड़ा था
 बस लोगों से भीख मांगने के लिए एक खाली कटोरा बस उसने वही पकड़ा था

तरह तरह के पकवान देखकर खाने की तमन्ना  जितने जोरो से होती है
एक गरीब की पहचान पैसा ऐढ़ने  वाले चोरों से होती है

जहां भगवान की मूरत देखकर लोगों ने ना जाने क्या-क्या चढ़ा दिया
और वहीं गरीब को देख कर उसे आगे बढ़ा दिया

गंदे गटर के नाले के पास रहना
कुछ दे दो साहब यह हर आते-जाते से कहना

लोगों की गालियां को सहना
कचरे के डब्बे से ही खाने की छोटी मोटी झूठी वस्तु लेना

इनकी जिंदगी का यही हिस्सा है
हर गरीब का यही किस्सा है

लाख गालियां खाने के बाद भी अगर कुछ मिले तो हाथ फैला लेने के लिए भी तैयार हो जाते हैं
यहां रोटी की भूख बहुत बड़ी होती है अगर रोटी मिल जाए तो  जिस्मफरोशी के लिए भी तैयार हो जाते हैं

 ना देने के लिए हर कोई बवाल कर लेता है
कोई अमीरी दिखाने के लिए फेंक कर देता है
खाने के लिए मांगने पर भी क्यु चाहिए पैसे हर कोई सवाल कर लेता है

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