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"धोखा" a poem on girl in hindi

"धोखा"


"धोखा" a poem on girl in hindi
"धोखा" a poem on girl in hindi

नन्ही सी गुड़िया अपने बाबा और माई के साथ बड़ी खुश रहती थी
अपने आप को बचपन से ही बड़ी दफ्तर की बड़ी अफसर कहती थी

छोटा सा परिवार आई बाबा और छोटा सा भाई
जिससे दिन भर की लड़ाई

रात रात में चुपके से किचन में लड्डू पेड़े खाना
और मेले में जाना

इसमें बड़ा मजा है
लेकिन पता ही नहीं चला कि कब बन गई यह सजा है

खिलौने और चॉकलेट के बहाने के बहाने से बुरा खेल लिया
फिर उसको बेचकर जिस्मफरोशी के गंदी कीचड़ में धकेल दिया

इस कीचड़ से बाहर निकलने की उसने बहुत की लड़ाई
लेकिन वह इस कीचड़ से कभी बाहर नहीं आ पाई
कहां तो बड़े अफसर देखने की ख्वाब देखती थी वह

और आज का बड़ा ही बदनाम नाम हो चुका है उसका
वह भी सोचती है की क्या कसूर है आखिर उसका

उसको पहले यह दुनिया बड़ी भोली लगती थी
लेकिन इस गंदगी में उसकी हर रोज बोली लगती थी

आखिर इस दर्दनाक जिंदगी को सहना सीख लिया था
बड़ी खुश हुई थी फिर आखिर उसने खुद की,भी खुद से मौत को गले लगा लिया था

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