.

"दर्द" कविता हिंदी में

"दर्द" 


"दर्द" कविता हिंदी में
"दर्द" कविता हिंदी में

ना जाने क्यों मैं आंसुओं को अपने पलकों पर रखती हूं
लौट आता है यह दर्द मेरे पास इस दर्द को सिर्फ मैं ही दिखती हूं

यह दर्द सिर्फ मुझे तन्हा करता है
यह मुझे अंदर से खाली करता है

अक्सर इस दर्द के चलते खुद से गुस्सा हो जाती हूं
तो कभी रुहासा हो आती हूं

न जाने यह दर्द तुम मुझसे किस तरह का मजाक करता है
न जाने यह मुझे हर पल तन्हा करता है

यह दर्द मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता है
यह मेरे आस-पास सिर्फ सन्नाटा रखता है

ना जाने किस अंजान सफर मैं और यह दर्द हम मिले और ना जाने यह सफर कब खत्म होगा
इसकी वजह से  दिल मायूस होगा

इस दर्द को सिर्फ मैं सहती हूं
बोलकर नहीं सिर्फ अल्फाजों से इस दर्द को लिखती हूं

इसकी होने से दिल किसी से बातें नहीं करता है
इसके होने से दिल इससे डरता है

अक्सर बेवजह यह दिल गुस्सा हो जाता है
यह दर्द अक्सर वक्त  को ठहरा देता है
 यह दर्द भी ज़ख्म गहरा देता है

Post a Comment

0 Comments