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"जिस्म" कविता हिंदी में

"जिस्म"


"जिस्म" कविता हिंदी में
"जिस्म" कविता हिंदी में 

हां जिस्म को बेचती हूं मैं अपनी हर रोज
फर्क बस इतना है कि मुझे खाने की भूख है और तुम्हें जिस्म की भूख है
हां इस तरह का पेशा रखने के बाद भी जीती हूं
खुद ही की आबरू को दफनाकर जहर पीती हूं
मुझे चरित्रहीन कहने से पहले यह तो सोच लो मुझे इस हालत तक पहुंचाने वाला कौन था
क्यों मुझ पर इतना कुछ बीत गया फिर भी जमाना क्यो मौन था
मेरे बाबा ने आंगन में फूल उग आया तो था लेकिन वह फूल खिला ही नहीं
जिस परिवार के प्यार के लिए मतलब पी रही वह मुझे परिवार का प्यार तो मिला ही नहीं
मेरे आबरू को कुचला है
जमाना बुरा था लेकिन फिर भी कीचड़ मेरे ऊपर उछला है




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