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"कीचड़"- एक लाचार महिला पर कविता हिंदी में

"कीचड़"

"कीचड़"- एक लाचार महिला पर कविता हिंदी में
"कीचड़"- एक लाचार महिला पर कविता हिंदी में 

हाँ खुद को धंधे वाली कहती हूं 
कीचड़ में रहती हूं

उस जमाने में क्या जीना जहां लाज और शर्म को संभालने के लिए पर्दा औरत से जोड़ दिया है
वहीं दरिंदे और हैवानियत से भरे जंगली जानवरों को भी खुला छोड़ दिया है

इस जमाने में जिस्म भी बिकता है
कितना भी छुपाना चाहे दरिंदगी का चेहरा लेकिन वह चेहरा दिखता है

केवल कपड़ों से ढकने की बात है इस जमाने में दरिंदे और हैवानियत से भरे हुए लोग केवल इंसानियत का नकाब पहने रहते हैं
झूठी दुनिया में गंदी नजर भले मर्द की क्यों ना हो लेकिन चरित्रहीन औरत को ही कहते हैं

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