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"सच्ची खुशी" कहानी हिंदी में

"सच्ची खुशी"


"सच्ची खुशी" कहानी हिंदी में
"सच्ची खुशी" कहानी हिंदी में 

इंतजार करती हुई नजरे बार-बार किसी के आने का इंतजार कर रही थी आखिरकार नजरे  थक गई और जैसे ही पलट कर सुमित जा ही रहा था कि तभी अचानक से साइकिल की "टिन-टिन" की घंटी बज गई। सुमित ने जैसे ही सामने देखा तो पोस्टमैन का का साइकिल पर आ रहे थे उनके चेहरे पर खुशी देखकर सुमित समझ गया था कि-
 "क्यों वह क्यों आए हैं।"
पोस्टमैन काका सुमित के पास पहुंचे और अपने साइकिल का स्टैंड लगाते हुए मुस्कुराहट के साथ अपने थैले में से एक बड़ा सा पार्सल निकाला और सुमित की हाथों में थमा दिया। इसे देखकर सुमित की चेहरे पर भी एक मुस्कुराहट आ चुकी थी।

पोस्टमैन काका ने सुमित की तरफ देखा और कहा "आज तो बड़ी नकदी देनी पड़ेगी इस हिसाब से यह पार्सल आया है।"
यह सुन सुमित ने कहा "काका वह दिन भी आएगा, जिस दिन चला कर आपको बड़ी नकदी दूंगा।"
यह सुनकर पोस्टमैन काका ने सुमित के सर पर हाथ रखा और कहा "उस दिन सिर्फ मुंह मीठा नहीं पूरा भोज करने  आऊंगा घर पर और उस दिन बड़ी नकदी भी लूंगा।"
सुमित ने कमरे में जाकर उस पैकेट को खोला तभी अचानक से पीछे से आवाज आई "क्या फिर से वही सब आया है। हजार बार कहा है इस फालतू कामों पर ध्यान मत दिया कर।"
यह सुनकर सुमित के चेहरे से वह हंसी गायब हो गई उसने पीछे मुड़कर कहां
  "मां! यह कुछ छोटी बात है, यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।"
यह सुनकर मां ने गुस्से में कहा "अरे पर मिलता क्या है इससे?"
इस बात पर सुमित ने कोई जवाब नहीं दिया। बस चेहरे पर अपनी एक मुस्कुराहट को सजा दिया सुमित कि वह मुस्कुराहट देखकर मां सुमित से ना जाने क्या क्या कहती  रही लेकिन सुमित की निगाहें केवल उस पार्सल पर ही थी। रात्रि में जब पिताजी आए तो फिर मां ने सब कुछ बता दिया पिताजी गुस्से में खड़े हुए और सुमित के पास गए और बोले- "क्या है यह सब।"
सुमित चुपचाप वहीं पर खड़ा हो गया। जैसे ही मां किचन में गई तभी पिताजी ने धीमी आवाज में मुस्कुराहट के साथ कहां
"आखिरकार छप गई तेरी रचना।"
सुमित ने भी मुस्कुराते हुए हां में सर हिला दिया सुमित ने उस पार्सल को खोला और एक किताब निकाली और पिताजी के हाथों में थमा दी।
जैसे ही पिता जी के हाथों में वह किताब आई तो पिताजी की आंखें नम हो गई। पिताजी ने सुमित को वो किताब फिर से पकड़ाते हुए कहा
"अच्छा! निकाल दो जरा अपनी रचना, किस पेज पर है जरा मैं भी तो पढूं।"

सुमित ने अपनी रचना उस किताब में से निकाली और किताब पिताजी के हाथों में फिर से पढ़ने लगे।
थोड़ी देर बाद पिताजी ने वह रचना पढ़ने के बाद अपनी चुप्पी तोड़ी और कहा "वाह! बहुत खूब।"
पिताजी ने सुमित के कंधे पर हाथ रख कहां
"कहीं सारे प्रकाशित जगहों पर तुम्हें अपनी रचनाएं दी है। लेकिन अब मैं चाहता हूं जल्दी ही तुम्हारी खुद की लिखी किताब प्रकाशित हो और उसे मैं पढ़ सकूं।"
यह सुनकर सुमित ने कहा "पिताजी! दरअसल मैं  एक किताब लिखने की सोच रहा था और इसके लिए लिखना आरंभ भी कर दिया।" यह सुनकर पिताजी के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई
कुछ दिनों बाद रविवार की शाम को जब घर पर सभी जने बैठे थे अचानक से पोस्टमैन की आवाज आई "सुमित! ओ... सुमित, यह लो तुम्हारा पार्सल आया है।"
सुमित दौड़कर बाहर गया और पोस्टमैन काका को घर के अंदर बुलाया और भोज के लिए बिठा दिया भोज खाने के बाद सुमित ने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और पोस्टमैन काका की हाथों में थमा दी।

यह सब देखकर पोस्टमैन काका ने मुस्कुराते हुए कहा "लगता है वह बड़ी खुशखबरी जिसका तुम्हें इंतजार था। वह आ चुकी है।"
 यह सुनकर सुमित ने कहा- "जी हां!"
उसके बाद पोस्टमैन काका वहां से चले गए सुमित ने आवाज लगाई
 "मीना ओ मीना।"
 तभी अचानक से किचन से मीना दौड़ी चली आई वो पार्सल सुमित ने मीना के हाथों में थमा दिया और कहां "यह लो तुम्हारे लिए।"
मीना ने जैसी ही उस पार्सल को खुला तो वह फूल फूली नहीं समाई खुशी से झूम उठी सुमित के भी चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट थी।

तभी पिताजी अचानक से आए और मीना की हाथों में वह पार्सल देख कहा
 "क्या है यह?"
मीना ने मुस्कुराते हुए कहा
 "पिताजी! यह देखो भैया ने मेरा एडमिशन कॉलेज में करा दिया है और यह किताब जो मुझे बहुत जरूरी थी वह भी खरीद के दी।"
यह सुनकर पिताजी ने कहा सुमित तुम्हारे पास इतने पैसे कहां से आए
यह सुनकर सुमित ने कहां "दरअसल पिताजी आपकी तो तनख्वाह इस महीने की खत्म होने के बाद में आएगी और मीना यह कब से यह किताब के लिए कह रही थी और मीना इस कॉलेज में अपना ऐडमिशन करना चाहती है। वह आगे पढ़ना चाहती हैं। इसलिए मैंने अपनी किताब के लिए ₹25000 जमा किए थे। इसकी ऐडमिशन पर लगा दिए।"
यह सुनकर पिताजी ने कहा- "परंतु बेटा यह पैसे तो तुम कितने सालों से जमा कर रहे थे। तुमने तो अपनी रचना लिख ली थी। इसे तुम इस पुस्तक में प्रकाशित करना चाहते थे।"

यह सुनकर सुमित ने कहा "पिताजी! मैं जानता हूं आप चाहते थे कि मेरी पुस्तक प्रकाशित हो। लेकिन मीना कुछ  भविष्य में हासिल करना चाहती है और किताब का क्या है वह तो मैं भविष्य में कभी भी प्रकाशित कर दूंगा। मेरी सच्ची खुशी तो इसमें है कि मेरी बहन पढ़ लिखकर भविष्य में कुछ हासिल करें।"
यह बात सुनकर पिताजी ने सुमित को गले से लगा दिया।

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