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तकलीफ | story on problem in hindi

"तकलीफ"

          तकलीफ़ | story on problem in hindi

 
पूरे घर पर शांति का माहौल था तब अचानक  से भागते हुए मेघा चाची आई और रोती बिलखती हुए कहा "एक बहुत ही बुरी खबर है मेरे पिता अब नहीं रहे।" इतना कहते हुए जोरो से रोते-रोते नीचे जमीन पर गिर गई। यह देखकर सुमित पूरी तरह से बौखला गया था। उसने सभी घरवालों का आवाज लगाई और सभी को इकट्ठा किया। सभी घरवाले बेचैन हो गए थे। लेकिन मेघा चाची को होश नहीं आ रहा था घबराते हुए घर के एक सदस्य ने कहा "आसपास कहीं से डॉक्टर को ले आओ।"
 यह सुनकर 10 साल के  सुमित ने कहा "क्या तीन गली छोड़कर डॉ साहब का क्लीनिक है ,क्या उन्हें बुलाऊं?" जो यह सुनकर सभी ने हां में जवाब दिया। सुमित ने तेजी  से अपनी छोटी सी साइकिल निकाली और पूरी रफ्तार उस को भगा दिया सुमित के मन में बार-बार यही आ रहा था "डॉक्टर साहब का तो क्लीनिक है। क्या वह क्लीनिक छोड़ आएंगे?" फिर सुमित के मन में यह आया कि "वह पिताजी के इतने अच्छी मित्र है और इस गंभीर अवस्था में जरूर आ ही जाएंगे।" इधर सुमित के फोन पर बार-बार घरवालों के फोन आ रहे थे। सुमित का सारा ध्यान डॉक्टर साहब के क्लीनिक पर पहुंचने का था कि तभी रास्ते से पीछे से होरन की आवाज आई। इसे देखकर सुमित ने अपनी साइकिल धीमी करते हुए साइड में रोका तो उसने देखा कि ताऊजी आ रहे थे। ताऊ जी ने कहा "कहां जा रहे हो?"
  तभी सुमित ने हाफ्ते हुए कहा "वो मेघा चाची की तबीयत खराब हो गई है। वे बेहोश हो गए हैं।"
 यह सुनकर ताऊजी ने हैरान होते हुए कहां "क्या?"
 यह बात सुनकर सुमित ने कहा "जी! हां मैं डॉक्टर साहब के क्लीनिक जा रहा हूं। ताकि उन्हें में ले आ सकूं।"
 ताऊ जी ने कहा "ठीक है! जब तक घर पर विवेक कार लेकर आता है। जब तक तुम डॉक्टर साहब को बुलाकर आ जाओ। ताकि डॉक्टर साहब एक बार देख ले। अगर ज्यादा बड़ी बात हो तो हम मेघा बिटिया को सीधी अस्पताल ले चलते हैं।"
 यह बात सुनकर सुमित ने हां में सर हिलाया और फिर से एक गाड़ी शुरू कर स्पीड में भगा दी  डॉक्टर साहब की क्लीनिक तक पहुंचने पर सुमित ने  तेजी से अपनी साइकिल में ब्रेक लगाया और बिना जूते उतारे क्लीनिक के अंदर चला गया। उस वक्त डॉक्टर साहब एक मरीज से बात कर रहे थे और वह मरीज बस जाना ही वाला था। तभी सुमित ने कहा "आप जल्दी से घर चलिए, मेघा चाची कि तबीयत खराब हो चुकी है।"
 यह बात सुनकर डॉक्टर साहब ने कहा "मैं तो मरीज को सिर्फ क्लीनिक पर ही देखता हूं। मैं तो घर पर नहीं देखता।"
 यह बात सुनकर सुमित ने चौक ते हुए कहा "पर डॉक्टर साहब उनकी तबीयत बहुत खराब है। एक बार आप देख लीजिए।"
 यह बात सुनकर डॉक्टर साहब ने हक लाते हुए कहा "नहीं, नहीं! मैं क्लीनिक और मरीज छोड़ कर कैसे जा सकता हूं नहीं नहीं।"
यह बात सुन सुमित ने निराश होते हुए तेजी से क्लीनिक से बाहर आया और अपनी साइकिल पर पैडिल मारने ही वाला  वाला था कि तभी डॉक्टर साहब के क्लीनिक में बैठा मरीज बाहर आया और उसने कहा "डॉक्टर साहब! आपको वापस दिखाने के लिए क्या मैं दो-तीन घंटे बाद दोपहर में आ सकता हूं।"
 यह सुनकर डॉक्टर साहब ने क्लीनिक के अंदर बैठे-बैठे ही जोर से कहा "हां हां! आ जाना, वैसे भी सारी अपॉइंटमेंट शाम के बाद की है और मैं तब तक फ्री हूं।"
 यह सब सुनकर सुमित हैरान हो गया और उसने हड़बड़ाहट में विवेक भैया को फोन लगाया और मेघा चाची को कार में बिठाकर अस्पताल के लिए सीधा रवाना कर दिया। इसके बाद भी सुमित सोचता रह गया। इंसान कैसे अपने फर्ज और दूसरे की तकलीफ को देख कर भी अनदेखा कर लेता है।

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