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स्त्री | poem on women in hindi

"स्त्री"
             स्त्री | poem on women in hindi

कभी नजरो से तो कभी अल्फाजो से शर्मिदा किया हैं
चरित्र हीन कह कर स्त्री शब्द को गंदा किया हैं
मेरे जिस्म के अलावा तुम्हारा मुझ से नाता ही किया हैं
लाँछन लगाने के अलावा तुम्हें और आता ही किया हैं
 सभी के साथ दुःख में,तकलीफ में भी हँस कर रह जाती हूँ
लाख तकलीफ़े और दर्द अकेले ही सह जाती हूँ
सभी को हँसी देने मे तुमने मुझे  रोते हुए नही देखा होगा
सभी की फिक्र करते हुए तुमने मुझे चैन से सोते हुए नही देखा होगा
मैं किस तकलीफ में हूँ आखिर मैं जान पाऊँगी
आखिर खुद को ही खो दिया हैं मैने ,क्या खुद को पहचान पाऊँगी
हॉ खुद को खुशमिजाज कहती हूं  
पता हैं आखिर मैं किसी तकलीफ में रहती हूं
एक गाय की तरह मेरे फंदा एक आँगन से निकाल दूसरे आँगन में जोड़ दिया है
बस मुझे बॉध कर सब को खुला छोड़ दिया है
घर वालो के सपने कह कर दौड़ पर उतारा जाता है
अगर कर लूं मन से कुछ तो मुझे लड़की होंने का कसूरवार ठहराया जाता है
हजारो दर्द को अपने कलेजे में समेट कर  भी जीती हूं
आँसू अपने चुपचाप ही पीती हूँ
 हर रोज लाँछन  और तीखे ताने से दिन ढलता है
कितना भी कठोर कर दो यह कलेजा यह भी घलता हैं
 सारे दर्द और तकलीफो को मुझे ही सहना है
बस सब के सामने चुप रहना है
मैं खुद ही बेचैन हो चुकी हूं
किसी और को क्या कहूं शायद मैं ही इस वक्त के सागर में खो चुकी हूं
आंसू आंखों से हर रोज बहते हैं
पँख फड़फड़ाने को मेरे दबे हुए सपने उन्हें आजाद करने को मुझे हर रोज कहते हैं

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