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लाचारी | poem on Helplessness in hindi

"लाचारी"
    लाचारी | poem on  Helplessness in hindi

लाचारी और गरीबी इंसान को कमजोर कर लेती है
बड़े से बड़ा गुनाह करने के लिए मजबूर कर देती है
 ठंड में कपकपाते  हुआ उस मासूम बच्चा के मदद के बजाय उसको हर किसी ने गरीब बोला है
ठंड में वह बाहर मर गया लेकिन किसी ने भी उसकी मदद के लिए दरवाजा नहीं खोला है
भूख ने जवाब दे दिया आखिर उसने उस कचरे के डब्बे में से खाने को भी वह तैयार हो गया
 काफी हफ्तों तक उसने कुछ नहीं खाया आखिर वह बीमार हो गया
उस गरीब के घर पर खाली थाली है
उसूलों को छोड़कर उसने भी खाने की भूख में चोरी कर डाली है
ढेर सारा काम करा कर उसको दिया हमेशा थोड़ा है
अपना फायदा देखने के लिए अब इस जमाने ने गरीब तक को नहीं छोड़ा है
उसको भी फायदे के अनुसार निचोड़ा है
और उसकी बढ़ रही हिम्मत और सपनों को हर कदम पर  तोड़ा है

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