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घर कविता हिंदी में । Poem on house in hindi

"घर"
घर कविता हिंदी में । Poem on house in hindi

अब अपना होने का हक नही जताते हैं
अब एक साथ वक्त नही बिताते है
आज कल कोई साथ नही रहता हैं
आज कल कोई दिल से अपना नही कहता हैं
जहां लालच और भेदभाव रिश्तो के लिये खंजर हैं
वही अपनो के बिना घर घर नही बस सब के लिये बजर हैं
अभी में अपनापन रख बड़ा होना सीखों
सभी की तकलीफ में खड़ा होना सीखों
करो कोशिश की तुमारे होते कोई नही रूठे
करो कोशिश की तुमारे होते किसी का ख्वाब नहीं टूटे
आज फिर घर ईटो से बना मकान बन गया
घर छोड़ बड़े घर की दौड़ में इंसान फिर नादान बन गया
घर नहीं यादों का बसेरा हैं
इस धर ने देखा अंधेरा और सवेरा हैं
बच्चे विदेश जाने की हौड़ में रहते हैं
वही घर के अपने अलग होने की दौड़ में रहते है
अकेले ही दर्द से आहे भरते हैं
कोई कितना भी चाए पर नफरत करते हैं
क्यो अजनबी बन आते हो
क्यो तकलीफो में करीबी बन जाते हो
क्यो दर्द में छोड़ देते हो
क्यो जीत में रिश्ता जोड़ लेते हो
क्यो सफर में खुद को अकेला ही भागते हुए देखना चाहते हो
क्यो नफरत ,तकलीफ दे अपनो को ही जागते हुए देखना चाहते हो

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